सुप्रीम कोर्ट ने राजनीतिक रैलियों और सार्वजनिक सभाओं में भीड़ प्रबंधन को लेकर दिशानिर्देश या मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) जारी करने की मांग वाली जनहित याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह मामला नीतिगत और कार्यकारी क्षेत्र से जुड़ा है, जिसमें अदालत हस्तक्षेप नहीं कर सकती।
मुख्य न्यायाधीश की अगुवाई वाली पीठ ने कहा कि भगदड़ जैसी घटनाएं बेहद दुखद और दुर्भाग्यपूर्ण होती हैं और इनमें लोगों की जान जाना गंभीर चिंता का विषय है। हालांकि, अदालत ने यह भी साफ किया कि हर राजनीतिक रैली या सार्वजनिक कार्यक्रम की परिस्थितियां अलग होती हैं, ऐसे में सभी आयोजनों के लिए एकसमान और व्यापक दिशानिर्देश बनाना व्यावहारिक नहीं है।
अदालत ने कहा कि भीड़ नियंत्रण, आपातकालीन निकास, पुलिस तैनाती, अग्निशमन व्यवस्था और अन्य सुरक्षा उपायों को तय करना सरकार, चुनाव आयोग और स्थानीय प्रशासन की जिम्मेदारी है। कोर्ट ने याचिकाकर्ता को सुझाव दिया कि वे अपनी मांगें केंद्र सरकार, संबंधित राज्य सरकारों और सक्षम प्राधिकारियों के समक्ष रखें, ताकि इस पर उचित नीतिगत निर्णय लिया जा सके।
पीठ ने यह भी कहा कि अदालतें कानून की व्याख्या और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए होती हैं, न कि प्रशासनिक या नीतिगत निर्णय लेने के लिए। राजनीतिक रैलियों, यात्राओं और जनसभाओं में सुरक्षा व्यवस्था तय करना कार्यपालिका का काम है।
यह याचिका हाल के दिनों में देश के विभिन्न हिस्सों में हुई भगदड़ की घटनाओं के बाद दाखिल की गई थी, जिनमें बड़ी संख्या में लोगों की मौत हुई थी। याचिकाकर्ता ने मांग की थी कि सुप्रीम कोर्ट राजनीतिक आयोजनों में भीड़ को नियंत्रित करने के लिए सख्त और स्पष्ट दिशानिर्देश जारी करे।
हालांकि, अदालत ने यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी कि इस तरह के निर्देश जारी करना न्यायपालिका के दायरे में नहीं आता। कोर्ट ने यह भी दोहराया कि स्थानीय प्रशासन और आयोजकों को ही हालात के मुताबिक सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम सुनिश्चित करने चाहिए।.







