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World Hepatitis Day: फैटी लिवर और वायरल हेपेटाइटिस एक जैसी बीमारी नहीं, समय रहते जानिए दोनों में क्या है फर्क

By Nandini Sharma

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fatty liver
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आजकल फैटी लिवर के मरीज तेजी से बढ़ रहे हैं। दूसरी ओर वायरल हेपेटाइटिस भी दुनियाभर में लिवर की गंभीर बीमारियों की बड़ी वजह बना हुआ है। चूंकि दोनों बीमारियां लिवर से जुड़ी हैं, इसलिए कई लोग इन्हें एक ही बीमारी समझ लेते हैं। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसा बिल्कुल नहीं है।

ShardaCare – Health City, Greater Noida के Senior Director & Unit Head, Gastroenterology डॉ. विनीत कुमार गुप्ता के अनुसार, फैटी लिवर तब होता है जब लिवर की कोशिकाओं में जरूरत से ज्यादा चर्बी जमा होने लगती है। इसकी सबसे बड़ी वजह हमारी खराब जीवनशैली होती है। मोटापा, डायबिटीज, हाई कोलेस्ट्रॉल, ज्यादा शराब पीना और लंबे समय तक शारीरिक गतिविधि की कमी फैटी लिवर का खतरा बढ़ा देते हैं।

डॉ. गुप्ता बताते हैं कि फैटी लिवर की सबसे बड़ी समस्या यह है कि शुरुआती दौर में इसके कोई खास लक्षण दिखाई नहीं देते। ज्यादातर लोगों को इसका पता तब चलता है, जब वे किसी दूसरी वजह से ब्लड टेस्ट या अल्ट्रासाउंड करवाते हैं। अगर इस पर समय रहते ध्यान न दिया जाए तो धीरे-धीरे लिवर में सूजन, फाइब्रोसिस और बाद में सिरोसिस जैसी गंभीर स्थिति भी बन सकती है।

वहीं वायरल हेपेटाइटिस एक संक्रमण है, जो वायरस की वजह से होता है। डॉ. गुप्ता के मुताबिक हेपेटाइटिस A, B, C और E इसके सबसे आम प्रकार हैं। इनमें हेपेटाइटिस A और E आमतौर पर दूषित खाना और गंदा पानी पीने से फैलते हैं, जबकि हेपेटाइटिस B और C संक्रमित खून, असुरक्षित इंजेक्शन या संक्रमित मां से बच्चे में फैल सकते हैं।

फैटी लिवर के उलट वायरल हेपेटाइटिस में अक्सर लक्षण जल्दी दिखाई देने लगते हैं। मरीज को बुखार, कमजोरी, पीलिया, जी मिचलाना और पेट में दर्द जैसी परेशानियां हो सकती हैं। डॉ. गुप्ता बताते हैं कि खास तौर पर हेपेटाइटिस B और C ज्यादा चिंता की बात हैं, क्योंकि ये लंबे समय तक शरीर में रह सकते हैं और इलाज न मिलने पर सिरोसिस या लिवर कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों का कारण बन सकते हैं।

अच्छी बात यह है कि दोनों बीमारियों की पहचान आसान जांचों से की जा सकती है। फैटी लिवर का पता लगाने के लिए डॉक्टर ब्लड टेस्ट और अल्ट्रासाउंड की सलाह देते हैं। वहीं हेपेटाइटिस B और C की पुष्टि के लिए HBsAg और Anti-HCV जैसे खास ब्लड टेस्ट किए जाते हैं। डॉ. गुप्ता कहते हैं कि इन जांचों की मदद से डॉक्टर आसानी से यह पता लगा सकते हैं कि मरीज को फैटी लिवर है या वायरल हेपेटाइटिस।

डॉ. गुप्ता सलाह देते हैं कि अगर किसी व्यक्ति को डायबिटीज, मोटापा या परिवार में लिवर की बीमारी का इतिहास है, तो उसे फैटी लिवर की जांच जरूर करानी चाहिए। इसी तरह जिन लोगों का कभी ब्लड ट्रांसफ्यूजन हुआ है, संक्रमित खून के संपर्क में आने की आशंका रही है या परिवार में किसी को हेपेटाइटिस B या C है, उन्हें भी अपनी जांच जरूर करानी चाहिए।

उनका कहना है कि समय पर जांच और इलाज से फैटी लिवर और वायरल हेपेटाइटिस, दोनों को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। स्वस्थ वजन बनाए रखना, नियमित व्यायाम करना, साफ और सुरक्षित खाना-पानी लेना, हेपेटाइटिस B का टीका लगवाना और समय-समय पर हेल्थ चेकअप कराना लिवर को स्वस्थ रखने के लिए बेहद जरूरी है।

लेख के अंत में डॉ. गुप्ता लोगों से अपील करते हैं कि लक्षण आने का इंतजार न करें। “लिवर तब तक कोई खास संकेत नहीं देता, जब तक उसे काफी नुकसान नहीं पहुंच जाता। इसलिए समय पर जांच कराना ही सबसे बड़ा बचाव है।”

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