महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री अजित पवार की बारामती में हुए विमान हादसे में मौत ने राज्य और देश की राजनीति को गहरा झटका दिया है। मुंबई से बारामती आ रहा उनका निजी विमान आपातकालीन लैंडिंग के दौरान दुर्घटनाग्रस्त हो गया, जिसमें अजीत पवार सहित कुल पांच लोगों की जान चली गई।
यह महज़ एक हादसा नहीं था, बल्कि उस राजनीतिक यात्रा का अचानक अंत था, जो बारामती से शुरू हुई थी और यहीं आकर खत्म हो गई।
अजित पवार का राजनीतिक जीवन उनके चाचा शरद पवार की विरासत से जुड़ा जरूर रहा, लेकिन उन्होंने हमेशा खुद को सत्ता की राजनीति के एक मजबूत खिलाड़ी के रूप में स्थापित किया। सात बार विधायक चुने गए पवार ने महाराष्ट्र में अलग-अलग सरकारों के साथ उपमुख्यमंत्री के रूप में काम किया और वित्त, सिंचाई और ऊर्जा जैसे अहम विभाग संभाले।
उनकी राजनीति विचारधारा से ज्यादा सत्ता संतुलन और रणनीति पर आधारित रही। यही वजह थी कि 2019 में उनका अचानक बीजेपी के साथ जाना और 80 घंटे में सरकार गिर जाना महाराष्ट्र की राजनीति का बड़ा मोड़ बन गया।
असल विभाजन 2023 में हुआ, जब अजित पवार ने एनसीपी को तोड़कर भाजपा-शिवसेना सरकार में शामिल होने का फैसला किया। इसके बाद चुनाव आयोग द्वारा पार्टी का नाम और चिन्ह उनके गुट को मिलना, इस टूट को स्थायी बना गया।
हालांकि 2024 के लोकसभा चुनाव में उन्हें झटका लगा, लेकिन विधानसभा चुनाव में 41 सीटों की जीत ने यह साबित कर दिया कि अजित पवार को हल्के में लेना राजनीतिक भूल हो सकती है।
अजित पवार की कहानी सिर्फ सत्ता की नहीं थी। यह कहानी थी महत्वाकांक्षा, जोखिम और बार-बार खुद को दोबारा स्थापित करने की। उनका अचानक निधन महाराष्ट्र की राजनीति में एक ऐसा खालीपन छोड़ गया है, जिसे भरना आसान नहीं होगा।







