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गाजियाबाद की त्रासदी ने बढ़ाई चिंता: विशेषज्ञ बोले — ऑनलाइन लत बच्चों के भावनात्मक तनाव का संकेत हो सकती है

By admin

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AI-Image: Online Content Addiction May Signal Deeper Emotional Issue
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गाजियाबाद में तीन नाबालिग सगी बहनों की दुखद मौत ने बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य और ऑनलाइन कंटेंट पर बढ़ती निर्भरता को लेकर गंभीर चिंता पैदा कर दी है। हालांकि मामले की जांच जारी है, मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि कई बार ऑनलाइन गेमिंग या डिजिटल कंटेंट पर अत्यधिक निर्भरता बच्चों में गहरे भावनात्मक तनाव, अकेलेपन और मानसिक दबाव का संकेत हो सकती है।

विशेषज्ञों के अनुसार डिजिटल लत अक्सर केवल व्यवहार की समस्या नहीं होती, बल्कि इसके पीछे भावनात्मक और सामाजिक कारण छिपे होते हैं। जो बच्चे भावनात्मक रूप से परेशान होते हैं, वे कई बार ऑनलाइन दुनिया में ध्यान भटकाने, जुड़ाव या राहत खोजते हैं, जिससे धीरे-धीरे निर्भरता बढ़ सकती है।

मनोचिकित्सकों और काउंसलरों का कहना है कि समस्या का समाधान दोष ढूंढना नहीं, बल्कि भावनात्मक संकेतों को समझना है। जब डिजिटल उपयोग वास्तविक जीवन के रिश्तों, दिनचर्या और सामाजिक संपर्क की जगह लेने लगे, तो यह गंभीर संकेत हो सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार शुरुआती चेतावनी संकेतों में अत्यधिक स्क्रीन टाइम, परिवार-दोस्तों से दूरी, चिड़चिड़ापन, नींद में गड़बड़ी, पढ़ाई में अचानक गिरावट और डिवाइस बंद करने पर भावनात्मक परेशानी शामिल हैं। सिरदर्द, थकान और भूख में बदलाव जैसे शारीरिक लक्षण भी दिखाई दे सकते हैं।

विशेषज्ञ बताते हैं कि जो बच्चे अकेलापन महसूस करते हैं, भावनात्मक रूप से संवेदनशील होते हैं या पढ़ाई और सामाजिक दबाव में रहते हैं, उनमें जोखिम अधिक होता है। बिना निगरानी डिजिटल उपकरणों की आसान उपलब्धता, असंतुलित दिनचर्या और शारीरिक गतिविधियों की कमी भी समस्या बढ़ा सकती है। कोविड लॉकडाउन के दौरान कई बच्चों में स्क्रीन पर निर्भरता बढ़ी, जो कुछ मामलों में बाद में भी जारी रही।

मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि समाधान सख्त प्रतिबंध नहीं, बल्कि संतुलित और मार्गदर्शित उपयोग है। अचानक रोक या कठोर सजा भावनात्मक तनाव बढ़ा सकती है। माता-पिता को बच्चों के साथ भावनात्मक जुड़ाव बनाए रखना, खुलकर संवाद करना और उनकी ऑनलाइन गतिविधियों को समझना चाहिए।

खुली बातचीत बेहद जरूरी है। बच्चों की भावनाओं को समझना, स्क्रीन समय सीमित करना, ऑफलाइन गतिविधियों को बढ़ावा देना, शारीरिक व्यायाम और संतुलित दिनचर्या बनाए रखना मानसिक संतुलन बनाए रखने में मदद करता है।

स्कूलों की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। काउंसलिंग, भावनात्मक जागरूकता कार्यक्रम और समय पर सहायता बच्चों को सहारा दे सकते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार बच्चों को सुना और समझा जाना चाहिए, न कि डांटा या दंडित किया जाना चाहिए।

विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि भावनात्मक अकेलापन अक्सर दिखाई नहीं देता। कई बार स्क्रीन की लत के पीछे गहरी भावनात्मक परेशानी छिपी होती है। गाजियाबाद की यह घटना हमें याद दिलाती है कि समय रहते पहचान, भावनात्मक सहयोग और संतुलित डिजिटल उपयोग बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य की सुरक्षा के लिए बेहद जरूरी है।

यदि आप या आपका कोई परिचित भावनात्मक परेशानी से गुजर रहा है, तो समय रहते पेशेवर सहायता लेना आवश्यक है।

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